कालबेल बजने से सुबह हूई और खटिया की चाय पहुंच गई। समय देखा तो आठ बज रहे थे। मिसिर जी याद आ गए कि जल्दी तैयार होना है। गुरुदेव खुमारी में थे,लेकिन भेड़ाघाट और धुंवाधार दर्शन के लिए तैयार होना ही था। जो प्राकृतिक सौंदर्य किताबों में पढा और चित्रों में देखा उसे प्रत्यक्ष देखने का उत्साह था। हम फ़टाफ़ट तैयार हो गए। मेरा नाश्ता करने का मन नहीं था। सिर्फ़ गोरस लिया और अवधिया जी ने नाश्ता किया विजय सतपती जी के साथ। नाश्ता करते करते मिसिर जी का फ़ोन आ गया कि वे पहुंच रहे हैं। गिरीश दादा को लेकर आते हैं। लेकिन दुश्मनो... read more »